भगवान राम के सिवा श्री कृष्ण भी तोड़ चुके है शिव धनुष

जैसा कि हम सभी जानते है भगवान शिव के धनुष का नाम पिनाक है आईए जानते है पिनाक धनुष के बारे में। 

 पिनाक : यह सबसे शक्तिशाली धनुष था। संपूर्ण धर्म, योग और विद्याओं की शुरुआत भगवान शंकर से होती है और उसका अंत भी उन्हीं पर होता है। भगवान शंकर ने इस धनुष से त्रिपुरासुर को मारा था। 

 शिव ने जिस धनुष को बनाया था उसकी टंकार से ही बादल फट जाते थे और पर्वत हिलने लगते थे। ऐसा लगता था मानो भूकंप आ गया हो। यह धनुष बहुत ही शक्तिशाली था। इसी के एक तीर से त्रिपुरासुर की तीनों नगरियों को ध्वस्त कर दिया गया था। देवी और देवताओं के काल की समाप्ति के बाद इस धनुष को देवराज इन्द्र को सौंप दिया गया था।

भगवान राम के सिवा श्री कृष्ण भी तोड़ चुके है शिव धनुष


उल्लेखनीय है कि राजा दक्ष के यज्ञ में यज्ञ का भाग शिव को नहीं देने के कारण भगवान शंकर बहुत क्रोधित हो गए थे और उन्होंने सभी देवताओं को अपने पिनाक धनुष से नष्ट करने की ठानी। एक टंकार से धरती का वातावरण भयानक हो गया। बड़ी मुश्किल से उनका क्रोध शांत किया गया, तब उन्होंने यह धनुष देवताओं को दे दिया।

 

 देवताओं ने राजा जनक के पूर्वज देवराज इन्द्र को दे दिया। राजा जनक के पूर्वजों में निमि के ज्येष्ठ पुत्र देवराज थे। शिव-धनुष उन्हीं की धरोहरस्वरूप राजा जनक के पास सुरक्षित था। इस धनुष को भगवान शंकर ने स्वयं अपने हाथों से बनाया था। उनके इस विशालकाय धनुष को कोई भी उठाने की क्षमता नहीं रखता था, लेकिन भगवान राम ने इसे उठाकर इसकी प्रत्यंचा चढ़ाई और इसे एक झटके में तोड़ दिया। 

 राम के अलावा श्रीकृष्ण भी तोड़ चुके हैं शिव धनुष


 श्रीकृष्ण भी तोड़ चुके हैं शिव धनुष (पिनाक)


 शिव धनुष श्रीराम ने सीता स्वयंवर के समय तोड़ा था। जिस धनुष को कोई बलशाली राजा हिला नहीं पाए थें, उसे राम जी ने बड़ी ही आसानी से तोड़ दिया था। इसके बाद राम और सीता जी का विवाह सम्पन्न हुआ था। लेकिन इसके बाद शिव धनुष टूटने से परशुराम जी काफी क्रोधित हुए थे। इस प्रसंग के बारे में तो काफी लोगों को पता है। 

लेकिन यह बहुत कम लोग जानते हैं कि भगवान श्री कृष्ण भी शिव धनुष तोड़ चुके हैं। श्री कृष्ण द्वारा शिव धनुष तोड़ने का प्रसंग भी बड़ा ही रोचक है। आइए विस्तार से बताते हैं आपको श्री कृष्ण ने शिव धनुष को क्यों तोड़ा।

जब भगवान विष्णु ने अपना आठवां अवतार श्रीकृष्ण के रुप में लिया तब कुछ परस्थितियों के कारण श्रीकृष्ण के हाथों शिवजी का धनुष टूट गया। यह घटना उस समय हुई जब कंस ने अक्रूरजी द्वारा श्रीकृष्ण को नंदगांव में मथुरा बुलाकर उनकी हत्या की योजना बनाई थी।

कंस के बुलावे पर श्रीकृष्ण अक्रूरजी के साथ धनुष यज्ञ में शामिल होने के लिए मथुरा आए। कंस से मिलने के पहले श्रीकृष्ण नगर भ्रमण करने चल पड़े। नगर भ्रमण करते हुए श्रीकृष्ण उस मंदिर पहुंच गए जहां यज्ञ का आयोजन किया था। 

उस ही मंदिर में कंस ने भगवान शिव का धनुष रखा था और इसी धनुष के लिए यज्ञ का आयोजन भी किया था


 श्रीकृष्ण ने बालक की तरह उत्सुक होकर इस धनुष को छूने की इच्छा जताई फिर मंदिर के पुजारी और धनुष के रक्षक सैनिकों से कहा कि वह इस धनुष को उठाकर देखना चाहते हैं। कृष्ण की इच्छा सुन कर पहले सभी हंसने लगे कि भला एक बालक इस धनुष को कैसे उठा सकता है, लेकिन श्रीकृष्ण ने खेल-खेल में ही धनुष को उठाकर तोड़ दिया।

भगवान राम के सिवा श्री कृष्ण भी तोड़ चुके है शिव धनुष



 कंस ने जब धनुष के टूटने का समाचार सुना तो वह घबरा गया क्योंकि ऐसी भविष्यवाणी थी की जो इस धनुष को उठा लेगा उसके हाथों कंस का वध होगा। मथुरा की जनता में खुशी का माहौल बन गया की कंस को मारने वाला आ गया। इस घटना के अगले ही दिन श्रीकृष्ण ने कंस का वध कर दिया और मथुरा को कंस के अत्याचार से मुक्त करवाया।

महाभारत में कौन कौन किसका अवतार था?

 आज हम जानेंगे महाभारत में कौन कौन किसका अवतार था? 

भारत का प्राचीन इतिहास ग्रंथ 'महाभारत' कई रहस्यों से भरा हुआ है। इसका प्रत्येक पात्र अपने आप में एक रहस्य है।महाभारत में जितने भी प्रमुख पात्र थे वे सभी देवता, गंधर्व, यक्ष, रुद्र, वसु, अप्सरा, राक्षस तथा ऋषियों के अंशावतार थे। उनमें से शायद ही कोई सामान्य मनुष्य रहा हो। महाभारत के आदिपर्व में इसका विस्तृत वर्णन किया गया है। आईए जानते हैं कि कौन किसका अवतार था?


भगवान कृष्ण

सबसे पहले बात भगवान कृष्ण की, भगवान कृष्ण को 64 कलाओं और अष्ट सिद्धियों से परिपूर्ण माना जाता है। वो विष्णु रूप में पूर्ण अवतार ले कर अवतरित हुए थे।


बलराम

बलराम के विषय में माना गया है कि वे विष्णु के आसन बने शेषनाग के अंश के रूप में जन्मे थे। जब कंस ने देवकी के 6 पुत्रों की हत्या की, उसी दौरान देवकी के गर्भ में बलराम पधारे। कृष्ण के बड़े भाई होने की वजह से उन्हें दाउजी के नाम से भी जाना जाता है। 


भीष्म

श्रीकृष्ण के बाद अगर महाभारत का कोई सबसे प्रमुख और चर्चित पात्र रहा तो वो हैं “भीष्म” पितामाह। पांच वसुओं में से एक ‘द्यु’ नामक वसु देवव्रत ने भीष्म के रूप में जन्म लिया था।


द्रोणाचार्य

कौरवों और पांडवों के गुरु रहे द्रोणाचार्य अत्यंत शक्तिशाली और पराक्रमी योद्धा थे। माना जाता है देवताओं के गुरु बृहस्पति देव ने ही द्रोणाचार्य के रूप में जन्म लिया था।


अश्वत्थामा

अश्वत्थामा, गुरु द्रोण के पुत्र थे। जिन्होंने महाकाल, यम, क्रोध, काल के अंशों के रूप में जन्म लिया था। महाभारत के युद्ध में पिता-पुत्र की इस जोड़ी ने बहुत कोहराम मचाया था।


कर्ण

कुंती ने विवाह पूर्व कर्ण को जन्म दिया था। उन्हें सूर्यपुत्र कर्ण भी कहा जाता है, क्योंकि कर्ण का जन्म सूर्यदेव के आशीर्वाद से हुआ था। माना जाता है अपने पूर्व जन्म में कर्ण एक असुर थे, जिस कारण एक राजवंशी होने के बाद भी उन्हें सिंहासन का सुख प्राप्त नहीं हुआ।








दुर्योधन

धृतराष्ट्र और गांधारी के सौ पुत्रों में सबसे बड़े पुत्र दुर्योधन का वास्तविक नाम सुयोधन था, लेकिन अपने कृत्य की वजह से उन्हें दुर्योधन नाम से पहचान बनाई। माना जाता है दुर्योधन और उसके भाई पुलस्त्य वंश के राक्षसों के अंश थे।


अर्जुन

अर्जुन को पांडु पुत्र माना जाता है, लेकिन असल में वे इन्द्र और कुंती के पुत्र थे। दानवीर कर्ण को इन्द्र का अंश ही माना जाता है

द्रौपदी

महाभारत की सबसे जरूरी और शायद सबसे शक्तिशाली स्त्री पात्र रहीं द्रौपदी का जन्म इन्द्राणी के अवतार के रूप में हुआ था।


रुक्मिणी

राजा भीष्मक की पुत्री और भगवान कृष्ण की पत्नी रुक्मिणी को माता लक्ष्मी का ही अवतार माना जाता है।


अन्य :

* अभिमन्यु चंद्रमा के पुत्र वर्चा का अंश था। मरुतगण के अंश से सात्यकि, द्रुपद, कृतवर्मा व विराट का जन्म हुआ था। अग्नि के अंश से धृष्टधुम्न व राक्षस के अंश से शिखंडी का जन्म हुआ था।


* विश्वदेवगण द्रौपदी के पांचों पुत्र प्रतिविन्ध्य, सुतसोम, श्रुतकीर्ति, शतानीक और श्रुतसेव के रूप में पैदा हुए थे।


* दानवराज विप्रचित्ति जरासंध व हिरण्यकशिपु शिशुपाल का अंश था।


* कालनेमि दैत्य ने ही कंस का रूप धारण किया था।


* इंद्र की आज्ञानुसार अप्सराओं के अंश से 16 हजार स्त्रियां उत्पन्न हुई थीं।

महाभारत से जुड़े 32 रोचक तथ्य


आज हम जानेंगे महाभारत से जुड़े 32 रोचक तथ्य

महाभारत से जुड़े 32 रोचक तथ्य

1. महाभारत के रचयिता वेदव्यास जी थे.

 2. महाभारत का वास्तविक नाम जयसंहिता था.

 3. ऐसा माना जाता है कि महाभारत के अभिमन्यु कल्याण नामक एक राक्षस की आत्मा थी। कृष्ण भगवान ने उनकी आत्मा को कैद कर द्वारिका मे एक अलमारी में रखा था.

 4. धृतराष्ट्र के पुत्रो का नाम कौरव था। और पांडु के पुत्रो का नाम पाडंव था.

 5. वेदव्यास रचित महाभारत को तीन चरणों में रखा गया था। पहले चरण में 8800 श्लोक और दूसरी चरण में 24000 श्लोक तथा तीसरी चरण में 100000 श्लोक लिखे गये.

 6. महाभारत युद्ध के दौरान कौरव सेना मे पांच सेनाध्यक्ष बनाये गये थे.

 7. यदुवंशी राजा शूरसेन की पृथा नामक कन्या व वसुदेव नामक पुत्र था। इस कन्या को राजा शूरसेन अपनी बुआ के संतानहीन लड़के कुंतीभोज को गोद दे दिया था। कुंतीभोज ने इस कन्या का नाम कुंती रखा। कुंती का विवाह राजा पाण्डु से हुआ था.

 8. जुए मे हारकर पांडव को 12 वर्ष वनवास तथा 1 वर्ष अज्ञातवास मिला था.

 9. महाभारत के सौप्तिक पर्व के अनुसार अध्याय 13 से 15 तक ब्रह्मास्त्र के परिणाम दिए गये । हमारे शास्त्रों के अनुसार 3 नवम्बर 5561 ईसा पूर्व छोडा हुआ ब्रह्मास्त्र परमाणु बम ही था.

 10. कौरव मे पहला सेनाध्यक्ष भीष्म पितामह थे.

11. भगवद् गीता महाभारत ग्रंथ का एक भाग है, जिसमे 18 अध्याय है.

 12. महाभारत के युद्ध मे पाडंव और कौरव की सेनाओ का अनुपात 7:11 का था.

 13. एकलव्य के पिता का नाम हिरण्यधनु था.

 14. गुरु द्रोणाचार्य के मागने पर एकलव्य ने दाहिने हाथ का अंगूठा काटकर दे दिया था.

 15. कुंती पुत्र कर्ण का बचपन का नाम वसुषेण था.

 16. महाभारत युद्ध के तीसरे दिन श्री कृष्ण अपनी प्रतिज्ञा तोडकर चक्र उठाकर भीष्म को मारने दौड पडे थे। 

 17. भीष्म पितामह 58 दिन तक शरशैय्या पर पडे रहे। 

 18. ब्रह्मास्त्र का प्रयोग सिर्फ दो ही योद्धा अर्जुन और अश्वत्थामा द्वारा किया गया था। 

 19. जरासंध व भीम का मल्लयुद्ध 14 दिन तक चला। 

 20. दुर्योधन के पुत्र का वध अर्जुन पुत्र अभिमन्यु ने किया था। 



 21. चक्रव्यूह मे फंसने के बाद अभिमन्यु को 6 महारथियो ने मिलकर मारा था। 

 22. श्री कृष्ण के बडे भाई बलराम जी की मृत्यु समाधि लेकर हुई थी। 

 23. महाभारत युद्ध की समाप्ति पर अर्जुन और श्रीकृष्ण के रथ से उतरते ही रथ  जल उठा और पूरी तरह भस्म हो गया था। 

 24. श्रीकृष्ण के कुल का विनाश युद्ध के 36 वर्ष बाद हुआ था। 

 25. भीम का केवल एक पुत्र जीवित रहा था जिसका नाम सर्वगा था । उसको परीक्षित से ज्यादा ज्येष्ठ होने के बावजूद सिंहासन नही सौपा गया, वो अपनी मातृभूमि काशी का शाषक बना था। 

महाभारत से जुड़े 32 रोचक तथ्य





 26. एकलव्य कृष्ण का चचेरा भाई था, वह देवाश्रवा वसुदेव के भाई का पुत्र था। जो जंगल में खो गया था,रुक्मणी स्वयंबर के दौरान पिता की रक्षा करते हुए एकलव्य की मृत्यु हो गयी थी। वह कृष्ण द्वारा मारा गया था। 

 27. कृष्ण के वैकुण्ठ जाने के बाद अर्जुन कृष्ण की पत्नियों को साधारण लुटेरो से नही बचा सके, इस दौरान उनका धनुष काफी भारी हो गया था और वो सारे मन्त्र भूल गये थे ,कृष्ण की आठ पत्नियों ने आत्महत्या कर ली और बाकि लुटेरो द्वारा अगुआ कर ली गयी थी। 

 28. महाभारत के समय एक अक्षौहिणी सेना में 21 हजार आठ सौ सत्तर रथ, 21 हजार आठ सौ सत्तर हाथी, एक लाख नौ हजार 350 पैदल सैनिक, पैंसठ हजार छह सौ दस घोड़े होते हैं। अर्थात 2 लाख 18 हजार 700 (218700) यह सभी एक अक्षौहिणी सेना में होते हैं। संपूर्ण 18 अक्षौहिणी सेना की संख्या जोड़े तो लगभग अनुमानित 1968300 सैनिकों की संख्या होती है.

 29. महाभारत के अनुसार इस युद्ध में भारत के प्रायः सभी जनपदों सहित कुछ विदेशी राज्यों ने भी भाग लिया था। माना जाता है कि महाभारत युद्ध में एकमात्र जीवित बचा कौरव युयुत्सु था और 24,165 कौरव सैनिक लापता हो गए थे जबकि महाभारत के युद्ध के पश्चात कौरवों की तरफ से 3 और पांडवों की तरफ से 15 यानी कुल 18 योद्धा ही जीवित बचे थे.

 30. महाभारत के युद्ध में 39 लाख 40 हजार योद्धा मारे गए।

31.महाभारत में विदुर यमराज के अवतार थे। ये धर्म शास्त्र और अर्थशास्त्र के महान ज्ञाता थे। ऋषि मंदव्य के श्राप की वजह से उन्हें मनुष्य योनी में जन्म लेना पड़ा था।

32.कुंती ने अपने बचपन में ऋषि दुर्वासा की सेवा की थी। वे कुंती की सेवा से प्रसन्न हुए और उसे एक चमत्कारी मंत्र बताया, इस मंत्र के माध्यम से कुंती किसी भी भगवान से बच्चा मांग सकती थी। इसलिए, विवाह के पहले कुंती ने सूर्य देव से शिशु की मांग की और कर्ण का जन्म हुआ। 

33. वेदव्यास नाम नहीं है बल्कि एक पद है जिसे वेदों की जानकारी रखने वाले व्यक्तियों को दिया जाता है। कृष्णद्विपायन से पहले 27 वेदव्यास थे और कृष्णद्विपायन 28वें वेदव्यास हुए , भगवान कृष्ण के रंग जैसे श्याम वर्ण और द्वीप पर जन्म लेने की वजह से उन्हें यह नाम दिया गया था।

आखिर क्यों शुभ है इस बार का करवा चौथ -karwachauth 2021

करवा चौथ व्रत का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। हिंदू पंचांग के अनुसार, कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। इस साल करवा चौथ 24 अक्टूबर 2021, दिन रविवार को पड़ रहा है। 

करवा चौथ व्रत को चंद्रमा दर्शन और अर्घ्य देने के बाद खोला जाता है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, इस साल करवा चौथ पूजा रोहिणी नक्षत्र में की जाएगी। यह शुभ संयोग करीब 5 साल बाद बन रहा है। इसके अलावा रविवार के दिन व्रत होने से सूर्यदेव का भी शुभ प्रभाव व्रत पर पड़ेगा।

आखिर क्यों शुभ है इस बार का करवा चौथ -karwachauth 2021


शुभ होने का कारण

इस बार करवाचौथ का व्रत और पूजन बहुत विशेष है। इस बार रोहिणी नक्षत्र और मंगल का योग एक साथ आ रहा है। ज्योतिष के मुताबिक यह योग करवाचौथ को और अधिक मंगलकारी बना रहा है। इससे पूजन का फल हजारों गुना अधिक होगा। 
 
करवाचौथ पर रोहिणी नक्षत्र का संयोग होना अपने आप में एक अद्भुत योग है। रविवार होने से इसका महत्व और बढ़ गया है। 

पति के लिए व्रत रखने वाली सुहागिनों के लिए यह बेहद फलदायी होगा। ऐसा योग भगवान श्रीकृष्ण और सत्यभामा के मिलन के समय भी बना था।

आखिर क्यों शुभ है इस बार का करवा चौथ -karwachauth 2021


क्यों खास है रोहिणी नक्षत्र

 आकाश मंडल के 27 नक्षत्रों में से रोहिणी नक्षत्र चौथा नक्षत्र है। इस नक्षत्र का स्वामी चंद्रमा हैरोहिणी चंद्रदेव की 27 पत्नियों में से एक हैं। यह सबसे सुंदर, तेजस्वनी और सुंदर वस्त्र धारण करनी वाली हैं। रोहिणी प्रजापति दक्ष की पुत्री हैं। सभी पत्नियों में चंद्रमा रोहिणी से ज्यादा स्नेह रखते हैं। आकाश मंडल में जब भी चंद्रमा रोहिणी के पास आते हैं, तब-तब उनमें निखार और अधिक बढ़ जाता है।

करवा चौथ पूजन का मुहूर्त


  चतुर्थी तिथि का आरंभ 24 अक्‍टूबर को सुबह 3 बजकर 1 मिनट पर होगा। जिसका समापन अगले दिन 25 अक्टूबर को सुबह 5 बजकर 43 मिनट पर होगा। इस बार चांद निकलने का समय 8 बजकर 11 मिनट पर है. पूजन का शुभ मुहूर्त 24 अक्टूबर को शाम 06:55 से लेकर 08:51 तक रहेगा। 

आ रही है माँ लक्ष्मी की विशेष कृपा देने वाली एकादशी- Rama Ekadashi 2021

 रमा एकादशी (Rama Ekadashi 2021) 

आज 21 अक्टूबर 2021 गुरुवार से कार्तिक महीने की शुरुआत हो चुकी है । कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को रमा एकादशी (Rama Ekadashi 2021) के नाम से जाना जाता है क्योंकि धन की देवी लक्ष्मी जी का नाम रमा है।और इस दिन माँ लक्ष्मी की विशेष कृपा पाई जा सकती है।

2021 में रमा एकादशी(Rama Ekadashi 2021)व्रत 1 नवंबर 2021 को रखा जाएगा । रमा एकादशी मां लक्ष्मी जी और भगवान विष्णु को समर्पित है। 

इस एकादशी के दिन मां लक्ष्मीजी के रमा स्वरूप के साथ भगवान विष्णु के पूर्णावतार की पूजा होती है. धार्मिक मान्यता है कि रमा एकदशी का व्रत रखकर भगवान विष्णु और मां लक्ष्मीजी की पूजा करने से सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। सभी प्रकार के दुख और पाप नष्ट हो जाते हैं।

इनकी विधि पूर्वक पूजा करने से धन से जुड़ी परेशानी एवं कर्ज आदि से भी मुक्ति मिल जाती है। 



रमा एकादशी की कहानी

 Rama Ekadashi Vrat Katha in hindi

 एक बार की बात है जब धर्मराज युधिष्ठिर भगवान श्री कृष्ण से रमा एकादशी व्रत की महत्वता और उससे जुड़ी पौराणिक कथा के बारे में पूछने लगे। तब भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को बताया की कार्तिक महीने की कृष्ण पक्ष की एकादशी को रमा एकादशी का व्रत किया जाता है। 

यह व्रत हमारे सभी पापों का नाश करता है। धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से इस कथा को सुनने की प्रार्थना की, तब भगवान श्रीकृष्ण ने कहा ठीक है, मैं आपको यह कथा सुनाता हूं आप इसे ध्यान पूर्वक सुनें।

 भगवान श्री कृष्ण कहते हैं, हे धर्मराज! प्राचीन समय में मुचुकुंद नाम का एक राजा राज करता था। उस राजा की मित्रता देवराज इंद्र, मृत्यु के देवता यम, धन के देवता कुबेर, एवं वरुण देव और विभीषण थी।


 उस राजा की एक पुत्री थी जिसका नाम चंद्रभागा था। राजा ने अपनी पुत्री का विवाह चंद्रसेन के पुत्र शोभन के साथ किया था। एक समय जब शोभन ससुराल आया था तब उन्हीं दिनों जल्द ही रमा एकादशी का व्रत भी आने वाला था।

 शोभन शरीर से दुबला पतला था और उसे भूख बर्दाश्त नहीं होती थी। लेकिन राजा ने पूरे राज्य में यह घोषणा करवा दी थी कि एकादशी के दिन किसी के भी घर भोजन नहीं बनेगा और ना ही कोई भोजन करेगा।

 राजा की यह घोषणा सुनकर शोभन चिंता में पड़ गया और अपनी पत्नी से जाकर बोला, चंद्रभागा मैं तो भूख बर्दाश्त नहीं कर सकता तुम कुछ ऐसा उपाय करो जिससे मेरे भोजन का प्रबंध हो सके, अन्यथा मैं बिना भोजन के मर जाऊंगा।

 चंद्रभागा ने कहा, स्वामी मेरे पिता के राज्य में एकादशी के दिन कोई भी भोजन नहीं करता इंसान तो छोड़िए इस राज्य में

 एकादशी के दिन किसी जानवर को भी भोजन नहीं दिया जाता है। 
चंद्रभागा ने कहा अगर आप भोजन करना चाहते हैं तो राज्य से बाहर किसी दूसरे स्थान चले जाइए क्योंकि इस राज्य में रहकर तो आपका भोजन करना असंभव है।

आ रही है माँ लक्ष्मी की विशेष कृपा देने वाली एकादशी- Rama Ekadashi 2021



 चंद्रभागा की बात सुनकर शोभन ने कहा अगर इस व्रत में तुम्हारे पिता कि इतनी आस्था है तो मैं भी यह व्रत जरूर करूंगा चाहे जो हो जाए।

 शोभन ने भी रमा एकादशी का व्रत रख लिया लेकिन कुछ समय बीतने के बाद ही वह भूख और प्यास से तड़पने लगा। सूर्यास्त के बाद जहां पूरा राज्य जागरण में मस्त था वही शोभन भूख और प्यास से पीड़ित था। सुबह होते-होते शोभन के प्राण पखेरू हो लिए और उसकी मृत्यु हो गई।

 राजा ने पूरे विधि विधान से शोभन का अंतिम संस्कार किया और चंद्रभागा को राज महल में ही रहने का निवेदन किया। पति की मृत्यु के बाद चंद्रभागा पिता के राज महल में ही रहने लगी।

 लेकिन रमा एकादशी व्रत रखने की वजह से शोभन को मंदराचल पर्वत पर एक सुंदर देवपुर प्राप्त हुआ जहां वह अप्सराओं के साथ और हीरे जवाहरात मोतियों के साथ रहने लगा। शोभन की जीवन शैली देखकर ऐसा प्रतीत होता था जैसे वहां दूसरा इंद्र विराजमान हो।

 कुछ समय बाद मुचुकुंद नगर में रहने वाला एक ब्राम्हण तीर्थ यात्रा करते हुए घूमता घूमता उस पर्वत की ओर जा पहुंचा। वहां जाकर जब उसने शोभन को देखा तो देखते ही पहचान गया कि वह राजा का जमाई शोभन है। शोभन भी उसे पहचान गया और उसे अपने पास बिठाकर राज्य के बारे में कुशल मंगल पूछा। 

ब्राह्मण ने कहा राज्य में राजा और सभी लोग कुशल मंगल है। लेकिन हे राजन, मैं यह नहीं समझ पा रहा हूं कि मृत्यु के पश्चात भी आपको यह सब कुछ इतना आलीशान महल इतना सुंदर राज्य कैसे प्राप्त हुआ।

 तब शोभन बोला की कार्तिक कृष्ण पक्ष की रमा एकादशी व्रत करने से मुझे यह नगर प्राप्त हुआ है। शोभन् ने कहा लेकिन ब्राह्मण देव यह सब अस्थिर है, कुछ ऐसा उपाय बताइए जिससे यह हमेशा के लिए स्थिर हो जाए।

 ब्राह्मण ने कहा, राजन स्थिर क्यों नहीं है? और स्थिर कैसे हो सकता है? आप बताइए जरूरत पड़ी तो मैं अश्वमेध यज्ञ भी करने को तैयार हूं। शोभन ने कहा मैंने पूरी श्रद्धा से रमा एकादशी का व्रत किया था

 इस वजह से मुझे यह सब प्राप्त हुआ लेकिन अभी तक मेरी पत्नी चंद्रभागा को इसके बारे में कुछ नहीं पता है इसलिए यह सब अस्थिर है। अगर आप जाकर यह सारी कहानी चंद्रभागा को बता दें तो यह सब स्थिर हो जाएगा।

 ब्राह्मण अपने राज्य वापस लौटा और राजा की पुत्री चंद्रभागा को सारी कहानी सुनाई। चंद्रभागा उसकी बात सुनकर बेहद प्रसन्न हुई है और ब्राह्मण से कहा कि आप सच कह रहे हैं या किसी सपने की बात कर रहे हैं। ब्राह्मण ने कहा पुत्री मैंने तुम्हारे पति को साक्षात देखा है यह कोई स्वप्न नहीं था।

 चंद्रभागा ने ब्राह्मण देव से निवेदन किया कि वह उसे लेकर उसके पति के पास जाएं और उन दोनों का मेल पुनः करवा दें। 

ब्राह्मण ने चंद्रभागा की बात सुनकर उसे मंदराचल पर्वत के समीप वामदेव ऋषि के आश्रम पर ले गया जहां वामदेव ने सारी बातें सुनी और वेद मंत्रों के उच्चारण से चंद्रभागा का शरीर दिव्य कर दिया। एकादशी व्रत के कारण चंद्रभागा दिव्य गति से अपने पति के निकट पहुंच गई।

 अपनी प्रिय पत्नी को देखकर शोभन अति प्रसन्न हुआ और उसे अपने पास बिठा लिया। चंद्रभागा कहने लगी हे स्वामी आप मेरे सभी पुण्यों को ग्रहण कीजिए। 

चंद्रभागा ने कहा पिछले 8 वर्षों से मैं अपने पिता के घर रमा एकादशी व्रत को विधिपूर्वक संपन्न करती आई हूं, इसलिए अब मैं आपके इस अस्थिर जीवन को स्थिर कर सकती हूं। चंद्रभागा ने अपने पुण्यो से वहां सब कुछ स्थिर कर दिया और अपने पति के साथ खुशहाल जीवन व्यतीत करने लगी।

 भगवान श्री कृष्ण ने आखरी में कहा, हे धर्मराज भविष्य में जो भी मनुष्य इस व्रत को विधि पूर्वक संपन्न करेगा उसके समस्त पाप नष्ट हो जाएंगे। भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि, कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की एकादशी एक समान है इन दोनों में कोई भी भेद नहीं है। इसलिए इन दोनों एकादशी का व्रत जो भी मनुष्य विधि पूर्वक संपन्न करेगा वह हमेशा सुखी जीवन व्यतीत करेगा।

इस दिन माँ लक्ष्मी को तुलसी के पत्ते जरूर अर्पित करने
 चाहिए।