श्रीला प्रभुपाद जी का जीवन परिचय

श्रीला प्रभुपाद जी का जीवन परिचय

आज हम जानेंगे श्रीला प्रभुपाद जी के जीवन परिचय के बारे मे 

हज़ारों मुश्किलों के बावजूद 70 साल की उम्र में पूरी दुनिया में पहुँचाया हरे कृष्णा मिशन.  श्रीकृष्ण जन्माष्टमी  के अगले दिन दुनियाभर में स्वामी प्रभुपाद का जन्मदिन मनाया जाता है , स्वामी प्रभुपाद वही दिव्य आत्मा थी जिन्होंने पूरे विश्व में हरे कृष्णा मिशन को पहुंचाया है। 

अभयचरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद  जिन्हें स्वामी श्रील भक्तिवेदांत प्रभुपाद के नाम से भी जाना जाता है,सनातन हिन्दू धर्म के एक प्रसिद्ध गौड़ीय वैष्णव गुरु तथा धर्मप्रचारक थे। आज संपूर्ण विश्व की हिन्दु धर्म भगवान श्री कृष्ण और श्रीमदभगवतगीता में जो आस्था है । 

श्रीला प्रभुपाद जी का जीवन परिचय


आज समस्त विश्व के करोडों लोग जो सनातन धर्म के अनुयायी बने हैं उसका श्रेय जाता है अभयचरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद को, इन्होंने वेदान्त कृष्ण भक्ति और इससे संबंधित क्षेत्रों पर शुद्ध कृष्ण भक्ति के प्रवर्तक श्री ब्रह्म-मध्व-गौड़ीय संप्रदाय के पूर्वाचार्यों की टीकाओं के प्रचार प्रसार और कृष्णभावना को पश्चिमी जगत में पहुँचाने का काम किया। 

प्रभुपाद जी का जन्म

भक्ति वेदांत स्वामी प्रभुपाद का जन्म 1896 ईं में कोलकाता के एक बिज़नेसमैन के घर में हुआ था,उनके पिता ने बेटे अभय चरण का पालन पोषण एक कृष्ण भक्त के रूप में किया जिससे उनकी श्रद्धा बचपन से ही श्री कृष्ण में बढ़ती ही चली गई थी।

 स्वामी प्रभुपाद बचपन में बच्चों के साथ खेलने के बजाए मंदिर जाना पसंद करते थे,उनको मंदिर जाकर बहुत अधिक सुकून मिलता था। जब ये 14 साल के थे तभी इनकी माता का देहांत हो गया, जिसके बाद वो बिलकुल अकेले पड़ गए थे।

 स्वामी प्रभुपाद ने Scottish Church College से पढ़ाई की वो बचपन से ही पढ़ने में काफी तेज़ तरार थे और उनकी अंग्रेजी बहुत अच्छी थी। इन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन के लिए चलाए जाने वाले असहयोग आंदोलन में भी गांधी जी का साथ दिया।

22 साल की उम्र में पिता ने इनका विवाह करा दिया,उस समय इनका प्रयागराज इलाहाबाद में खुद का फार्मेसी का व्यवसाय था। अपने काम के साथ ही स्वामी प्रभुपाद अलग अलग गुरुओं से मिलते रहे और सन 1922 में इनकी मुलाकात एक प्रसिद्घ दार्शनिक भक्ति सिद्धांत सरस्वती से हुई, जो 64 गौडीय मठ के संस्थापक थे।

 सिद्धांत सरस्वती उन्हें देखते ही समझ गए प्रभुपाद की अंग्रेजी इतनी ज्यादा अच्छी है कि विदेश के लोग भी जल्दी समझ नहीं पाएंगे, इसलिए  सिद्धांत सरस्वती ने उन्हें समझाया कि वे अंग्रेजी भाषा के माध्यम से ज्ञान का प्रसार करें। उन्होंने कहा - प्रभुपाद आप तेजस्वी हो, कृष्ण के बहुत बड़े भक्त हो । 

इसलिए कृष्ण भक्ति को विदेश तक पहुंचना है। क्योंकि दूसरे देशों का  ज्ञान तो हमारे देश मे आ रहा है, लेकिन हमारे देश का ज्ञान कही और नही जा रहा। 

  स्वामी प्रभुपाद ने अपने गुरु की आज्ञा मानते हुए श्रीमद भगवद गीता को अंग्रेज़ी में लिखना शुरू कर दिया, वो दिन - रात मेहनत के साथ ट्रांसलेट करने में लगे रहे और लगभग 1 साल के भीतर उन्होंने  श्रीमद भगवद गीता को अंग्रेजी में लिख डाली।

 एक दिन स्वामी प्रभुपाद जब घर आए और उन्होंने अंग्रेजी में लिखे हुए पन्नों को नहीं देखा तो वो घबरा गए,उन्हें लगने लगा एक साल ही मेहनत बर्बाद हो गई। फिर उन्होंने अपनी पत्नी से पूछा, क्या तुमने वो पन्ने रखें है क्या? इसके बाद उनकी पत्नी ने जो बातें कही उसे सुनकर दंग रह गए।

 उनकी पत्नी बोली- चाय खरीदने के लिए वो पन्ने कबाड़ी को बेच दिए।   54 साल की आयु में स्वामी प्रभुपाद ने गृहस्थ जीवन से अवकाश लेकर वानप्रस्थ ले लिया ताकि वो अपने लेखन को अधिक समय दें सके। फिर कुछ समय बाद वो वृन्दावन चले गए और वहां जाकर अनेकों साल तक गंभीर अध्ययन और लेखन में सलंग्न रहे। 

1959 में उन्होंने संन्यास ग्रहण कर लिया और श्री राधा-दामोदर मंदिर में ही अठारह हजार श्लोक संख्या के श्री मद भागवत पुराण का अनेक खंडों में अंग्रेजी में अनुवाद और व्याख्या की। 

श्रीमद् भागवत के प्रारंभ के तीन खंड प्रकाशित करने के बाद श्री प्रभुपाद सितंबर 1965 ई. में कुछ किताबें, कपड़े और साथ 7 डॉलर लेकर मालवाहक जहाज से अमेरिका पहुंचे। 32 दिन के यात्रा के दौरान उन्हें 2 बार हार्ट अटैक भी आया। 

श्रीला प्रभुपाद जी का जीवन परिचय



जब यह न्यूयॉर्क शहर पहुंचे तो उस समय वियतनमी और न्यूयॉर्क का युद्ध चल रहा था।  उस वक़्त हिप्पी लोग नंगे रोडों पर घूमते, एवं नशा करते थे, इन सब से वहां की सरकार परेशान हो गयी थी। तभी स्वामी जी ने सोचा क्यों ना इन्हीं से शुरुआत की जाए, स्वामी जी ने इनके लिए कीर्तन शुरू किए। 

लेकिन हिप्पी लोग इनका लगातार अपमान करते थे, उन्हें परेशान करते थे, लेकिन फिर भी स्वामी जी इनके लिए सुबह शाम भोजन बनाते थे, और कथा सुनाते थे। 

अनजान देश में पहुंचकर श्रीमद् भागवत को दूसरों तक पहुंचाना और समझाना बेहद ही कठिन था, क्योंकि अमेरिका में उन्हें उस वक़्त पहचानने वाला कोई न था, लेकिन उन्होंने अपनी प्रयास जारी रखी। 

उन्हें खुद पर यकीन था कि एक न एक दिन विदेश में  श्रीमद् भागवत को दूसरों तक पहुंचाने में सफल हो जाएंगे। स्वामी प्रभुपाद की मेहनत रंग लाई और धीरे धीरे ये लोग परिवर्तित होने लगे और भगवत गीता का पाठ करने लगे और अमेरिकन सरकार भी इनसे खुश हो गयी थी। 

यहां लगभग उनके 10,000 शिष्य बन गये थे, जिनको स्वामी जी ने प्रचार के लिए विश्व के भिन्न स्थानों पर उपदेश एवं ज्ञान देने के लिए भेजा। इन्होंने लगभग 5.5 करोड़ किताबें इस दौरान अन्य भाषाओं में ट्रांसलेट की। इन्होंने आध्यामिकता में ध्यान दिया न कि किसी धर्म विशेष को प्रोत्साहित किया।

श्रीला प्रभुपाद जी का किताबों के रूप में योगदान

हालांकि, श्रील प्रभुपाद का सबसे महत्वपूर्ण योगदान उनकी किताबें हैं। अकादमिक समुदाय द्वारा उनकी प्रामाणिकता, गहराई और स्पष्टता के लिए अत्यधिक सम्मानित, इन्हें कई कॉलेजों में मानक पाठ्यपुस्तकों के रूप में उपयोग किया जाता है। उनके लेखन का ग्यारह भाषाओं में अनुवाद किया गया है।

 भक्तिवेदान्त बुक ट्रस्ट, जिसे 1972 में स्थापित किया गया था,  जो विशेष रूप से उनके कार्यों को प्रकाशित करने के बनाया गया है, इस प्रकार भारतीय धर्म और दर्शन के क्षेत्र में पुस्तकों का दुनिया का सबसे बड़ा प्रकाशक बन गया है।


अपने जीवन के आखिरी दस वर्षों में, बुढ़ापे के बावजूद, श्रील प्रभुपाद ने पूरे विश्व की बारह बार यात्रा की। इस तरह के थकान भरे कार्यक्रम के बावजूद, श्रील प्रभुपाद ने प्रचुर रूप से लिखना जारी रखा। उनके लेखन वैदिक दर्शन, धर्म, साहित्य और संस्कृति के एक वास्तविक पुस्तकालय का गठन करती हैं। 

श्रील प्रभुपाद अपने पीछे वैदिक दर्शन और संस्कृति का एक वास्तविक पुस्तकालय छोड़ गये। भक्तिवेदान्त बुक ट्रस्ट 50 से अधिक भाषाओं में उनकी पुस्तकें प्रकाशित करता है।

1966 से, जब तक उन्होंने 1977 में अपनी आखिरी सांस ली; श्रील प्रभुपाद ने दुनिया भर में यात्रा की, विश्व के नेताओं से मुलाकात की, व व्याख्यान और साक्षात्कार देकर वैदिक दर्शन को समझने के लिए लोगों को भावना प्रदान की।

ISKCON की स्थापना

अत्यंत कठिनाई भरे क़रीब एक वर्ष के बाद जुलाई, 1966 में उन्होंने अंतररास्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ ISKCON की स्थापना की। 1966 में इस्कॉन को स्थापित करने के समय उन्हें सुझाव दिया गया था कि शीर्षक में "कृष्ण चेतना" के बजाए 'भगवान चेतना' बेहतर होगा, उन्होंने इस सिफारिश को खारिज कर दिया।

 उन्होंने कहा कि कृष्ण के नाम में भगवान् के सभी रूप और अवधारणाएं शामिल हैं। 1967 में सैन फ्रांसिस्को में एक और केंद्र शुरू किया गया और वहां से उन्होंने पूरे अमेरिका में अपने शिष्यों के साथ यात्रा की। सड़क पर चलते हुए चिंतन, पुस्तक वितरण और सार्वजनिक भाषणों के माध्यम से आंदोलन को लोकप्रिय बनाया गया।

 सन 1966 से 1977 के बीच  लगभग 11 वर्षो में उन्होंने विश्व भर का 14 बार भ्रमण किया तथा कृष्णभावना के वैज्ञानिक आधार को स्थापित करने के लिए उन्होंने भक्तिवेदांत इंस्टिट्यूट की भी स्थापना की। यह अपने जीवन काम के मात्र 2 घंटे आराम करके 22 घंटे काम करते थे। 

श्री प्रभुपाद जी का निधन

श्री प्रभुपाद जी का निधन 14 नवंबर, 1977 में प्रसिद्ध धार्मिक नगरी मथुरा के वृन्दावन धाम में हुआ। कहा जाता है कि जब यह मृत्यु शैय्या पर लेटे हुए थे, तब भी यह गीता ज्ञान के उपदेश को रिकॉर्ड कर रहे थे। पूरी दुनिया में अरबों की  प्रॉपर्टी होने के बावजूद उन्होंने  सारा पैसा उन्होने समाज की सेवा में लगाया। 

स्वामी प्रभुपाद ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने अकेले ही पूरे विश्व मे भगवत गीता के ज्ञान को पूरे जोश से फैलाया। अपने आप को कम न आंककर, ईश्वर द्वारा प्रदत्त प्रतिभाओं को उपयोग में लाकर अपने गुरु द्वारा दिए गए आदेश का पालन किया। 

श्री भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद थे भारत के एक ऐसे स्वामी जिन्होंने विषम परिस्थितियों में भी हार नही मानी और लगातार प्रयास करके अपना एक कीर्ति मान कायम किया और पूरे विश्व मे अपने नाम और काम का डंका बजवाया।


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