होलिका दहन के बाद जरूरी है माता शीतला की पूजा

होलिका दहन के बाद जरूरी है माता शीतला की पूजा

रंगों के अद्भुत त्योहार होली के बाद चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को शीतला माता की आराधना की जाती है। इसलिए इस दिन को शीतला अष्टमी के रूप में जाना जाता है।
गुजरात में यह त्योहार कृष्ण जन्माष्टमी के एक दिन पहले मनाया जाता है। इसे वहां शीतला सप्तमी कहा जाता है।  
इस दिन माता शीतला की पूजा की जाती है। 
देशभर के मंदिरो शीतला माता के मेले का आयोजन होता है। इस त्योहार को कई जगह बासौड़ा भी कहते हैं। माता शीतला को बासी भोजन का भोग लगाने की प्रथा है।  इस दिन घर में ताजा खाना नहीं बनता, महिलाए एक दिन पहले रात को ही खाना बना लेती हैं, उसी खाने से माता शीतला की पूजा की जाती है।
 ऐसी मान्यता है कि माता शीतला शांति की देवी हैं जो विभिन्न प्रकार की बीमारियों से भक्तों की रक्षा करती हैं। इस दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान किया जाता है। माता शीतला की पूजा का सामान लेकर माता शीतला मंदिर में होलिका दहन की जगह पर भोग लगाया जाता है।  
स्वास्थ्य की रक्षा के लिए एक  नियम है कि जब भी मौसम में बदलाव हो अपने खान-पान और रहन-सहन में भी उसी के अनुसार परिवर्तन कर लिया जाए। अन्यथा कोई बीमारी आपको जकड़ सकती है। शीतला माता की पूजा कर के हमे मौसम में आने वाले वदलाव को स्वीकार करना चाहिए।